सफलता का रहस्य – “अर्जुन”

“कॉफी” हमारी आजकल की दुनिया में दोस्तो से मिलने का सबसे अच्छा बहाना यहीं है,इसलिए राहुल ने भी मनाने का अच्छा तरीका ढूंढ लिया है जिसपर सामने वाला मना ही नहीं कर पाए , ‘ कॉफी पे मिलते है ‘ ,पहले मुझे ऐसा लगता था कि ये कॉफी वॉफी सब अमीरों के चोचले है (माध्यम वर्गीय बुद्धि) ,वो इसलिए कि हम लोग चाय पीते है तो उनको कुछ नया करना होता है तो वो कॉफी पीने लग गए,ठीक वैसे ही जैसे हम सरसो के तेल में खाना बनाते तो वो हानि बताकर रिफाइंड तेल लेके आगए और जब हम रिफाइंड तेल का प्रयोग करने लग गए तो सुना है अब वो भी हैल्थी नहीं है ,वो ऑलिव ऑयल ले आए है 😅। खैर जो भी हो ,पर कॉफी का नशा ही अलग है इस बात का एहसास उस दिन हुआ ,जब कॉलेज के समय ,एक कॉम्पटीशन कि तैयारी में हम चंडीगढ़ में रुके थे और रात भर जाग कर सुबह चले गए वेन्यू पर,और नींद भयंकर आराही थी,हमने कैंटीन में कॉफी ऑर्डर करी वो नॉर्मल नेसकैफे मशीन की हॉट कॉफी  थी पर वो नींद का नशा था या नजाने क्या ,मुझे आज भी याद है में ११ कप कॉफी पी गया और उसके बाद भी मुझे रोका गया ज्यादा कैफ़ीन का नुक़सान बता कर ,वरना वो दिन नशा तो ब्लेंदेड स्कॉच के पेग से भी खतरनाक था,खासकर वो कप में जो अंत में थोड़ी से कॉफी बचती है,हा बिल्कुल वहीं आखरी वाली कॉफी,बस उसी दिन से एक तरफा आशिकी है कॉफी से जिसे में मुकम्मल नहीं करना चाहता बस आनंद उठाना चाहता हूं क्यूंकि मुकम्मल करने के प्रयास में आशिक़ के खोने का भी तो खतरा होता है ।
हमारे मित्र राहुल की बहुत खूबसूरत आदत है ,हा वहीं वाली की बस पांच मिनिट में पहुंच गया ,फिर वो पांच मिनिट आधे एक घंटे के होते है । बस उसके आते ही मेरा घंटे भर इंतजार करने का गुस्सा बरस पड़ा ,पर वो भी कम होशियार थोड़ी है ,वो आते ही बचाव के लिए रिसेप्शन से हमारी माशूका को लेते हुए आये कॉफी। फिर माहौल हसी मजाक में बदल गया ,मेने फिर उससे धीरे से पूछा कि भाई हुआ क्या है अचानक मिलने को यहां बुलाया । तब भाई भावुकता व्यक्त करने की कोशिश में फुटेज़ खाने लग गए , गाली तो निकली मन से भाई साहब के अभिनय के लिए पर कंट्रोल करना पड़ता है ,क्या करे ,फिर भाई ने बताया कि परसो वो शादी में गया था ना , “मेने बोला हा तो”, बोले भाई वो भी आयी थी ,मेने बोला “हैं वो कोन” ,बोले,भाई वहीं यार ,मुझे जो इसकी आखरी प्रेमिका का याद थी उसका नाम लिया (नाम नहीं ले सकते ,भाई की लेे ली जाएगी)  बोले भाई वो नहीं यार अरे वो दसवीं वाली ,मेने बोला “अच्छा अच्छा” ,खैर मुझे बिल्कुल नहीं पता था कि वो लड़की है कौन,पर भाई का जो एक शब्द थाना वो दसवीं वाला प्यार बस इतना ही काफी था उसकी भावना समझने के लिए ,पता नहीं लड़कियों को याद रहता हो या ना हो ,पर हा हम ज़रूर आज भी एक आद पेग बाद मन ही मन तुम्हे याद जरूर कर लेते है 😂। मेने फिर उससे नहीं पूछा कि नाम क्या है ,क्यूंकि वो दसवीं वाली पहली मोहब्बत का जिक्र होते ही, हम पूरे लड़को की कौम की सहानभूति सामने वाले के साथ हो जाती है और हम एक ही बात बोलते है “हा भाई समझ सकते है होता है सबके साथ होता है “। फिर भाई ने धीरे से बोला कि अनुराग मेने बोला “हा” ,भाई वो ट्रेडिशनल पहन कर आई थी,बस इतना कहना था, और मेरी सहानभूति ने उसकी भावना के आगे शाष्टांग समर्पण कर दिया हो और ये कॉफी की मुलाकात अब शायद डी चिल्ड बियर की मोहताज होने लगी थी,मतलब आप खुद ही सोचिए आपकी पहली मोहब्बत या क्रश भारतीय परम्परागत लिबाज़ में हो,मात्र कल्पना में इतनी आकर्षण है इसका तो जब उस लड़की की मुख की “आकृति (shape)” आपके सामने होगी तो क्या मदहोशी होगी आपकी ।
मेने उससे पूछा “फिर अब” ,तो बोले कि यार में उसके लायक नहीं मेने बोला “हैं” बोले भाई काबिल बनना है,सक्सेस लेके ही उसके काबिल बन सकते है। बस इतनी बकेती ही काफी होती है सहानभूति को गाली में परिवर्तित होने के लिए।  मेने बड़ी ही तहज़ीब भरी गालियां देते हुए बोला भाई ,तेरी खुदकी क्लासेज है खुदकी इनकम है ,घर से सक्षम है चाहता क्या तू ,मर्सिडीज लेके ही सफलता मिलेगी क्या तेकों,तो भाई वहीं फर्जी भावुकता वाली शक्ल के साथ बोले ,की यार रहनेदे ,तू नहीं समझेगा । उसकी बकलौली के लिए दिल से गंदी गालियां निकल रही थी पर क्या करे ,में भी इमोशनल अस्त्र से घिरा हुआ था । फिर मैने उसे सवाल किया कि भाई जिस सफलता का रोना तू गा रहा है ,तेरे लिए सफलता है क्या बतातो,उसका वाजिब जवाब उसके पास नहीं था। में उस दिन भी उसे एक कहानी सुनाना चाहता था ,जो उस दिन ना सुना पाया ।
सफलता ,यह ऐसी चीज है जो हम सबको चाहिए ,पर इसकी परिभाषा हम सब के लिए अलग अलग है ,किसी के लिए कंपनी का सीईओ बनना सफलता है ,किसी के लिए कोई कॉम्पटीटिव एग्जाम निकला ना,किसी के लिए विदेश के कॉलेज में भर्ती मिल जाना ,या किसी के लिए सरकारी या निजी नौकरी ही सफलता की परिभाषा है । गायक,नृत्य,अभिनय,खेल आदि विभिन्न प्रकार की मंजिल है लोगो की सफलता की कई परिभाषा वह भी है। वास्तव में सफलता है क्या चीज,शायद हमारे मन द्वारा बनाई गई निर्धारित महत्वाकांक्षा ही हमारी सफलता की अलग-अलग परिभाषाए बनती है। भले अलग अलग मतलब हो सफलता का हमारे लिए पर चाहिए तो सबको ही ,तो उस सफलता की प्रेरणा का मार्ग क्या है असल में ,चलिए समझने की कोशिश करते है महाभारत की कहानी से ।
“अर्जुन” का नाम लेते ही सबके मन में वो पेड़ पर बैठी चिड़िया की आंख याद आजाती है ,या शायद कईयों को सूर्यपुत्र कर्ण ,आखिर आपका विरोधी इतना महान हो शायद तभी अर्जुन सर्वश्रेष्ठ योद्धा बन के उभरा महाभारत का ,मेने अक्सर देखा है लोगो को बहस करते हुए की अर्जुन के साथ कृष्ण थे ,इसलिए वो जीतता रहा और कर्ण ने बचपन से कई कष्ट सहे निश्चित ही मानव इतिहास में कर्ण के जैसा दानवीर ,शूरवीर दूजा कोई नहीं है । पर हम आज अर्जुन की बात करेंगे और शायद उसी की कहानी में छुपा है ,हम सबकी सफलता का मार्ग ।
आपने कभी सोचा है हमारे इतिहास में ,रामायण की कथा हो या महाभारत की ये अरण्य (वन) का जिक्र बार बार क्यूं आता है ,क्यूं भगवान राम या पांडव पुत्र जब वनवास को जाते है ,तो उसे इतना गहराई में दर्शाया गया है ,वो दरअसल इसलिए क्युकी वन या जंगल ही वो जगह है जहां सृष्टि के वास्तविक नियम लागू होते है ,और हम इंसानों के नियम नहीं चलते ,जैसे इंसानों की नगरी में आप राजा है ,मंत्री है ,सिपाही है ,व्यापारी है या बाकी प्रजाजन है ,सबके अपने पद और ग्रह है ,जमीन जायदाद है ,पर जब आप अरण्य में प्रवेश करते है ,तो जंगली जानवर या राक्षस  ये नहीं देखेगा की आपका पद क्या है आप राजा है या प्रजा वो तो सबपे आक्रमण करेगा ,वैसे ही जैसे रह में पड़ा नुकीले पत्थर और कांटे सबको चुभेंगे । इसलिए वन में जाने को ,इतना महत्व दिया है क्यूंकि आप असली मोह छोर कर त्याग करने निकल जाते हो।
अर्जुन और उसके सभी भाइयों का जन्म जंगल में हुआ ,उन्होंने बचपन से ही जंगल के नियमों का साथ जीना ,और सृष्टि से बहुत कुछ ज्ञान प्राप्त कर लिया । फिर पांडु कि मृत्यु के बाद ,वे सभी विदुर के साथ हस्तिनापुर के लिए निकल गए ,राजभवन की राजनीति और गंगापुत्र भीष्म से वो ज्ञान ले ही रहे थे कि अब उनका गुरुकुल में जाने का समय आ गया था ,और उन्हें और उनके १०० बाकी भाइयों को शिक्षित करने का कार्य सौंपा गया ,महागुरु द्रोण को । जब गुरु द्रोण ने युधिष्ठिर से पूछा कि तुम्हे पेड़ पर क्या दिख रहा है ,तो उन्हें उस पक्षी का जीवन ,तीर के प्रहार से पेड़ को होने वाली हानि का खतरा दिख ,दुर्योधन को मौका मिला तो उसे ,पेड़ पर बैठी चिड़िया दिखी,फिर वो आगे बढ़ कर भीम के पास पहुंचे  उन्हें चिड़िया के साथ वृक्ष पे लगे फल भी दिखाई देने लगे ,गुरु द्रोण निराश होके आगे बढ़े और उन्होंने अर्जुन से पूछा कि तुम्हे क्या दिख रहा है वहीं सब जो तुम्हारे बड़े भाईयो को दिखता है । तब अर्जुन ने कहा मुझे आंख दिख रही है केवल चिड़िया की आंख,तब गुरु द्रोण ने धीरे से आदेश दिया प्रहार का ,और अर्जुन के धनुष से तीर सीधा ,चिड़िया की आंख के आरपार निकल गया ,शायद उसी पल गुरु द्रोण और भारत की भूमि को एक महान योद्धा मिल चुका था ,ये घटना बाल पन से ही उसकी लक्ष्य के प्रति एकादृष्टी (focus) को दर्शाती है । 
फिर अर्जुन ने उसी गुरुकुल में दोनों हाथो से धनुष चलाने की कला और अंधेरे में भी वार करने का हुनर अपनी मेहनत और लगन से सीखा ,तभी गुरु द्रोण ने उसकी विभिन्न परीक्षा लेते हुए ,उसके गुरु के प्रति पूर्ण समर्पण के कारण उसे दिव्यास्त्रों का ज्ञान दिया (Dedication)
जब द्रोण ने अपने शिष्यों से गुरु दक्षिणा मांगी तब भी ,अर्जुन के कारण ही द्रुपद को हारना पड़ा और अपना आधा राज्य द्रोण को सौंपना पड़ा ,और अर्जुन ने अपनी गुरु दक्षिणा पूर्ण करी।
अर्जुन वापिस राजमहल तो आगाए पर ,पांडवो को लाक्षाग्रह के हादसे के बाद वपिस जंगल जाना पड़ा ,फिर अर्जुन द्रौपदी को स्वयंवर में जीत गया और उसके पश्चात पांडव को वापिस राजभवन नसीब हुआ और उन्हें आधा राज्य दिया गया खांडवप्रस्थ यानी इंद्रप्रस्थ में ,जहां अर्जुन को अपने ही धर्म पिता और देवताओं के राजा इन्द्र से युद्ध करना पड़ा ,जिन्हें उन्होंने लगभग लगभग हरा दिया ,इन्द्र को हराने वाला कोई मामूली व्यक्ति नहीं हुआ है ,किसी भी युग यहीं उसके कौशल (skill) को दर्शाता है । यहीं वो युद्ध था जहां पूर्व में उसे ,अग्निदेव ने प्रसन्न होकर “गांडीव” दिया था ।
फिर अर्जुन की मदद से बाकी पांडवो ने राजसूय यज्ञ कर ,युधिष्ठिर को सम्राट बनाया । द्रौपदी के साथ पांडवो ने वी अह पश्चात एक मर्यादा रखी थी कि एक वर्ष तक उसका एक h पति होगा ,और उस वर्ष में ,उस पति के अलावा कोई दूजा , यज्ञसेनी द्रौपदी के कक्ष में प्रवेश नहीं करेगा । उस दिन इंद्रप्रस्थ पे एक हमला हुआ ,जिसमें राज्य की सारी गाय (असल संपत्ति) चुरा ली गई ,पर अर्जुन का गांडीव द्रौपदी के कक्ष में था और ,उस समय युधिष्ठिर द्रौपदी के कक्ष में थे और अर्जुन को अस्त्र उठाने अंदर जाना ही पड़ा ,जबकि उन्हें उसका अंजाम मालूम था ,अर्जुन कक्ष में गए शस्त्र उठाया और शत्रुओं को परास्त कर दिया ,पर उन्हें मालूम था अब उन्हें बनाई हुई मर्यादा के कारण ,वनवास भुगतना पड़ेगा युधिष्ठिर और द्रौपदी सबने उसे धर्म का हवाला देते हुए रोकने का प्रयास किया ,पर वो तो अर्जुन थे अपना धर्म जानते थे (honesty),निकल पड़े भगवा पहन कर भारतवर्ष के भ्रमण पे वे इंद्रप्रस्थ से निकले उत्तरपूर्व में नागालैंड और मणिपुर की और ,फिर वो वहा से निकाल कर पहुंचे रामेश्वरम ,जहां उन्हें परम भक्त बजरंगबली से अपना घमंड कूर करवाने का अवसर मिला ,फिर वो पहुंचे अंतिम वर्ष में ,सोमनाथ मंदिर गुजरात में,आप इस यात्रा को सोच के देखो तो उन्होंने लगभग पूरे भारत वर्ष की भूमि का भ्रमण और तपोबल अर्जित कर लिया था ,एक ऋषि के भाति ,और शायद यही वो यात्रा थी जिसने उन्हें इतना महान बना दिया था ,फिर वो वापिस अपने वन और पश्चाताप की यात्रा पूरी कर इंद्रप्रस्थ (आज के जमाने की दिल्ली) पहुंचे कई वर्षों बाद । दरअसल वास्तविक ज्ञान वहीं अर्जित करता है ,जो अपने गृह और मोह से निकल कर दुनिया देखता है ,और सृष्टि से सीखता है ,तभी भगवान राम ,हमारे आदर्श है ।
एक दफा अप्सरा उर्वशी अर्जुन के ऊपर मोहित होकर उससे मिलने को आई ,और उससे संभोग की इच्छा जताई ,पर अर्जुन ने यह कहते हुए मना कर दिया ,की आप के संबंध मेरे पूर्वज के साथ रहे है, ये के कर उसने जाता दिया था ,की उसका तप स्त्री और हवस के आगे भी कमजोर नहीं पड़ता । (winning over lust) 
अर्जुन का अधिकांश जीवन अबतक वन में ही बीता था ,पर ये तो शुरआत थी क्यूंकि अब घड़ी थी असली परीक्षा की ,फिर वो घटना हुई द्रौपदी के चीरहरण की,जिसने पूरे भारतवर्ष का इतिहास बदल दिया ,पांडवो को वनवास और अज्ञातवास हुए ,पर असली वनवास तो उन सबके मन में चलरहा था ,क्यूंकि उन सबको पता था ,की वनवास के बाद क्या होना ,अर्जुन का में आक्रोश से भरा हुआ था ,क्यूंकि उसने भी अपनी आंखो से अपनी पत्नी का अपमान देखा और वो कुछ ना कर पाया ,उसका मन विचलित तो था ही वो अज्ञातवास से पूर्व वनवास के अंतिम समय में , देवों के देव महादेव की तपस्या को निकाल पड़ा और उन्हें प्रसन्न कर उन्होंने प्राप्त कर लिया भगवान शंकर का पाशुपत अस्त्र ।
 फिर अज्ञातवास हुआ पांडव विराट नगर में छुपे थे ,हस्तिनापुर को इस बात का पता लग गया और वो हमला करने एक तरफ से आ गए ,अर्जुन को छोड़ बाकी पांडव तो युद्ध में पहुंच गए ,पर अर्जुन नहीं का पाया क्युकी वो एक स्त्री की वेश में छुपा था , ठीक उसी समय ,भारतवर्ष की सबसे बड़ी और ताकतवर सेना हस्तिनापुर की सेना ने आक्रमण कर दिया । जिस सेना के सेनापति खुद गंगापुत्र भीष्म हो (जिनके लिए श्रीकृष्ण को अस्त्र उठाना पड़ा था) उसकी ताकत का अंदाजा आप लगा ही सकते है ,और जिस सेना में भगवान परशुराम के तीन शिष्य हो (भीष्म,द्रोण और कर्ण) उनसे ताकतवर भला कौन ही ही सकता है । पर विराट के राजभवन में दूसरे तरफ से हुए हमले का जवाब देने हेतु कोई मौजूद ही नहीं था ,महल की स्त्रियां विचलित हुए ,तब बालक राजकुमार उत्तर ने बोला में जाऊंगा ,और बृहनला (अर्जुन स्त्री के वेश में ) उनके सारथी बन निकल पड़ी युद्ध भूमि में ,पर वो थे तो बालक ही वो इतनी विशाल सेना देख के डर गए ,दुर्योधन भी राजकुमार बालक को देख उपहास करने लगे,फिर सूर्य जैसे ही ढलने वाला था ,बृहानला(अर्जुन) रथ को पलटा कर ,जंगल की ओर गए ,वहा पेड़ हिला कर ,उन्होंने कपड़े में बंधे एक धनुष को निकाला ,बालक राजकुमार चकित होगया ,उन्होंने पूछा बृहंला से की तुम्हे केसे पता यहां अस्त्र है ,फिर उन्होंने डरते हुए पूछा तुम असल में हो कोन,तब बृहनला ने जवाब दिया –
“मेरी मां का नाम पृथा है इसलिए में “पार्थ” कहलाता हू ,वो रत्नों से जड़ा मुकुट मुझे देवराज इन्द्र ने दिया था इसलिए में “कीर्ति” भी कहलाता हू,मेरे दोनों हाथों से शस्त्र चलाने की वजह से कुछ लोग मुझे “सभ्यसांचि” भी कहते है , राजसुई यज्ञ के दौरान मेने सभी राज्यो से उनकी धन सम्मप्ती जीत ली थी लोग मुझे “धनंजय” भी कहते है ,भगवान अग्नि ने मुझे एक रथ और ये धनुष भेट किया था ,फिर उसने जैसे ही गांडीव उठा के प्रत्यंक्षा चढ़ाई पूरी युद्ध भूमि उसकी धनुष की टंकार से गूंज उठी , में ही हूं वो जिसे ये भारत वर्ष स्वेतवाहना “गांडीव धारी अर्जुन” के नाम सा जनता है ।
वो दिन था विराट युद्ध का ,और द्रौपदी के आक्रोश से भरे अर्जुन का युद्ध ,अर्जुन कौरव सेना पे ऐसे टूट पड़ा ,जैसे मानो स्वयं महाकाल तांडव कर रहे हो ,अर्जुन ने एक एक कर सभी योद्धाओं को घायल करना शुरू कर दिया ,खुद उसके गुरु द्रोण तक उसको नहीं हरा पा रहे थे ,उसने कर्ण को अधमरा कर दिया जिसे बचाने के चक्कर में कर्ण के भाई को अपनी जान गंवानी पड़ी ,अर्जुन भोलेनाथ के तांडव जैसे पराक्रम दिखा रहा था ,क्यूंकि उसका में आक्रोश से भरा था ,अगर भीम ने वचन ना लिया होता ,तो उसी दिन अर्जुन पूरी कौरव को मर गिराता,फिर अर्जुन ने प्रयोग किया सम्मोहन अस्त्र  का ,और पूरी सेना को(भीष्म केवल आधे होश में थे) अकेले परास्त कर दिया और बालक राजकुमार उत्तर को आदेश दिया सभी,महारथियों के ,ऊपर के वस्त्र उतारलो ।
इस युद्ध के बाद महाभारत का असल युद्ध हुआ था ,जिसमें क्या हुआ हम सब जानते है ,पर ये युद्ध काफी है आपको अर्जुन की ताकत का बोध कराने के लिए।
अर्जुन की सफलता का राज में अलग अलग उदाहरण के जरिए समझने कि कोशिश की ,पर वास्तविकता तो यही है  जिसका अधिकांश जीवन ही जंगल में और तपोबल में बीता हो ,उससे महान हो ही कोन सकता था ।अर्जुन ज्ञान और त्याग की मूरत है ,आप खुद सोचे जिसे स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने गीता का ज्ञान देने के लिए चुना हो ,और उन्हें “नर” यानी नारायण का अंश कहा हो ,वो कोई मामूली व्यक्ति तो हो नहीं सकता ,क्यूंकि अर्जुन,मात्र एक योद्धा नहीं था ,वो एक तपस्वी और त्यागी था। (Focus,hardwork,honest ,dedication,faith on teacher,winning over lust,clear view and complete devotion)
चाहे आपका लक्ष्य किसी भी फील्ड से हो आप सभी अर्जुन के जीवन के अंश को खुदसे मिला कर देख सकते है और कुछ ना कुछ सीख कर है जाएंगे,इसी में छिपा है हम सबकी सफलता का राज क्या हम इतना त्याग करने के काबिल है ,चाहे लक्ष्य कोई भी ही उसे पाने का रास्ता केवल दो ही शब्दों में सम्मिलित है “तपस्या और त्याग”। 
#Be_Like_Arjuna
~ अनुराग मिश्रा

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