भारत,दुनिया और कोरोना ।

प्रत्येक नव वर्ष एक व्यक्ति के जीवन में नई आशाओं के साथ आता है ,चाहे इस वर्ष हमारी इच्छाएं पूरी हो या ना हो,पर हा ये नया साल हमे एक उम्मीद जरूर दे जाता है,की इस साल मुझे अपने जीवन में ये लक्ष्य ज़रूर हासिल करना है । मैंने भी अपनी आशाओं और उम्मीदों का बोझ २०२० पे डाल दिया ,अगले ही महीने मुझे नई नौकरी के साथ नई शुरुआत करनी थी इसलिए जनवरी के महीने में अपनी नानी के यहां निकल गया अपने ननिहाल की तरफ उमंग से  भरे मन के साथ । गोरखपुर पहुंचते ही रेलवे स्टेशन पर मेरे मामा मुझे लेने आए गए ,जो वास्तव में अपने होते है उनसे मिलने का उमंग केवल महसूस किया जा सकता ,शब्दों में व्यक्त नहीं ,क्यूंकि उनके चेहरे का भाव से ही प्रसन्नता दिख जाती है । पूर्वांचल की बात ही कुछ और है ,जब भी जाता हूं,यह भाषा भोजपुरी , टेंपो वालो की बोली ” ए भइया कहां जाए के बा ” ,और जब आप टूटी फूटी भोजपुरी में जवाब देते है , ‘ कहीं नाही ‘ बस इतना पल से ही एहसास होता है ,की अपनी मिट्टी की सादगी ही आपको सच्चे प्रेम की अनुभूति करा पाएगी । हम चाहे अपना जीवन संवारने के लिए सालो पहले अपना गांव छोड़ने पे मजबूर हो गए हो,पर आपका गांव आपकी मिट्टी आपको नहीं भूलती वो आपको पुकारते रहती है । यहीं खूबसूरती है भारत देश की जिसकी सादगी उसके गावों में बस्ती है,जहां मामा ,चाचा,दादा आदि रिश्तों को उतना ही सम्मान दिया जाता है ,जितना आप अपने माता पिता को देंगे ।

फरवरी का महीना शुरू हो गया ,और नानी के हाथो का खष्टा खाकर और पूर्वांचल के मर्चे के अचार का स्नेह बटोर के में आ गया वापिस इंदौर अपनी मंजिल को तलाशने । किसी भी चीज की नई शुरुआत हमेशा आपको डराती जरूर है कि क्या होगा ,केसे होगा वहां लोग केसे होंगे ,पर हा किसी भी मंजिल को पाने के लिए एक बहुत आसान चीज की जरूरत होती है ,वो है शुरआत करने की ,बस इसी हिम्मत के साथ मैने भी शुरुआत कर दी ,इस नए सफर की तरफ। फिर इस नौकरी के साथ में भी व्यस्त होगया चंद दिनों में ही,अच्छे साथियों और उम्मीदों की साथ
रोजाना की तरह ,वहीं सुबह सात बजे उठा और ऑफिस जाने के लिए समय के साथ अपनी ‘ रेस ‘ शुरू कर दी और फिर वही रोजमर्रा का अस्त व्यस्त सा जीवन ।
आपके सच्चे साथी या शुभचिंतक वहीं होते है ,जिनसे आप भले महीनों में बात करे ,पर ऐसा लगता है ,जैसे पिछली कॉल से ही वार्तालाप दुबारा शुरू हो गया हो और उसपर आपके परम मित्र का फोन आजाए तो क्या ही बात है।
अनुपम का फोन आते ही ,जैसे मेरी सारी थकान मिट गई ,वो पूछने लगा कि नए लोग नई जगह सब केसे है और में उसको बताता गया । बातो बातो में कॉलेज के समय के जैसे हम वहीं समाज, देश, दुनिया की बाते करने लग गए ,जब आपका और आपके साथियों का  दृष्टीकोण या लक्ष्य एक सा हो तो ,सकारात्मकता आपके वार्तालाप से झलकता है ,या ये भी कह सकते कि शायद हमारे विचार एक से है ,इसलिए हमारी मित्रता इतनी घनिष्ठ है । मुझे राजनीति विषय पसंद है और उसे वैश्विक नई तकनीकों और विषयों में रुचि है ,यहीं चर्चा चलरही थी कि तभी उसने मुझे ,चीन में फैले ” कॉरॉना वायरस ” के बारे में बताया ,जिसने हजारों जाने लेली है ,जिसके कुछ मरीज भारत में भी पाए गए है ,और वो विश्व के दूसरे देशों जैसे ईरान और यूरोप के इटली  में भी फैलने लगा है । दरअसल उसका ये कहना था ,की ये वायरस चीन ने ,एक जैविक हथियार के रूप में विकसित किया है ,और वो इससे अमरीका,भारत और यूरोपी  देशों पे इस्तमाल करना चाहता है,दरअसल चीन की अर्थव्यवस्था पहले ही खराब है ,और वो इस लाइलाज बीमारी के जरिए ,हमारी प्रगति को पीछे दखेलना चाहता है । मुझे टॉम क्रूज़ की मिशन इंपॉसिबल याद आ गई जो हमने इंजीनियरिंग के समय साथ में देखी थी ,मेने उसे बोला भाई अगला पार्ट आने दे अपने आप पता चल जाएगा क्या होगा ,तू घर बैठे बैठे कहानियां मत बना । इसी ठहाके के साथ हसी मजाक और भावुकता भरी हमारी बाते ख़तम हो गई और सोने का समय हो गया ,वैसे समय के बंधन का एहसास अब हुआ ,क्यूंकि विद्यार्थी जीवन में यहीं फोन और बाते मध्यरात्रि तक चलती ,पर अब ये टेंशन है कि ,कल सुबह समय पर उठ कर नौकरी पे जाना है जिसके लिए पूरी नींद की भी आवश्यकता है । समय का बंधन ही ऐसी चीज है जिसमें हम समय रहते हुए खुद ना बंधे तो यही समय आपकी बर्बादी का कारण बन जाता है । सोने से पहले मेने कोरोना वायरस के बारे में जरूर पढ़ा ,और पाया कि अनुपम की बाते सच थी ,इस महामारी ने वास्तव में ,दुनिया में खलबली मचा रखी है ,और भारत में भी इसके चंद मरीज मिले है ,और अमरीका के सीनेटर टॉम कॉटन का बयान भी पढ़ा जिसने आरोप लगाए है की ये जैविक हथियार के रूप में चीन ने जानबुझ कर विकसित किया है ,तब मुझे आश्चर्य हुआ कि यदि मानलो ये वास्तव में चीन ने बनाए है ,तो वो अपने ही हजारों लोगों को क्यों मारेगा ,खैर मुझे इस बात का भी एहसास हो गया कि मेरे दोस्त इतना ज्ञान केसे दे रहा था ,उसकी इंटरनेट की रिसर्च हमेशा से ही तगड़ी रही है ,इसी मुस्कान के साथ सोचते हुए में सो गया अगले दिन से फिर रोज़मर्रा की ” रेस ” में जो दौड़ना था ।
“त्योहार” कईयों के लिए ये शब्द खुशी का एहसास होता है ,कुछ के लिए वापिस छुट्टी के दिन और बाकी मेरे जैसे नौकरी पेशा लोगो के लिए , घर जाने का उमंग और ऊपर से त्योहार होली का हो ,तो ‘ सवारी बस ‘में बैठते से ही ,गुजिया की महक जाने कहा से मन ही मन विचारो में ललचाने लगती है । होली की छुट्टियों के बाद जब में वापिस आ रहा ,तब मेरा भाई जो दिल्ली में पढ़ाई कर रहा है ,उसका फोन आया कि मेरी ३१ मार्च तक छुट्टियां लग गई है ,मेने कहा आज १४ तारिक है इतनी लंबी छुट्टियां क्यूं,तब उसने बताया कोरोना वायरस महामारी से बचाव के लिए इसलिए घर वापसी की टिकट करवा दो। मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ ,और तब मैने घर आके समाचार देखा तो एक महीने पहले जो अनुपम और मेरा वार्तालाप था इस विषय को लेके ,वो चरितार्थ होता दिखा, इस लाइलाज बीमारी का जाल सम्पूर्ण भारत में फैलने लगा है । फिर चंद दिनों में ही जानता कर्फ्यू और भागम भाग मुझे अचानक सबके मन में एक भय कि अनुभूति दिखी ,जो शायद इससे पहले मेने कभी नहीं देखी थी ।
तब मैने इसके बारे में पढ़ना शुरू करा और मुझे भी एहसास होने लगा कि ,ये वास्तव में कोई जैविक हथियार ही है ,जो भी हो मेरे सोचने से कुछ साबित तो हो नहीं जाता ,पर हा इस सोचने मेरे मन को इस विचार विमर्श में जरूर डाल दिया कि क्या विश्व की महाशक्ति बनने के लिए ये देश इंसानियत ही भूल गए है ,क्या सबसे सक्षम और सबसे ताकतवर बनने की इस रेस में ,ये बड़े बड़े देश मानवता ही भूल गए है । क्या ये वही चीन है जिसके हम सबसे बड़े खरीददार है ,जो हर छोटी चीज चाहे वो प्लास्टिक के खिलौने हो,या मोबाइल और मोटर गाडियां भारत में बड़े पैमाने पर निर्यात करके पैसे कमाता है ,क्या वो इस पैसे को हमारे ही नागरिकों को मारने के लिए इस्तमाल कर रहा है । क्या हम भारतीय जो इस पूरी दुनिया की १७ प्रतिशत आबादी है ,क्या वे इतने सक्षम नहीं जो अपनी जरूरत की चीजे खुद ही बनाले। वो अमरीका भी आज घुटनों के बल गिर गया है इस महामारी के सामने ,जो कल तक पूरी दुनिया में अपनी ताकत ,और धन पे इतराता था , क्यूं उसकी तेल की खदानें अब काम नहीं आरही जिसके लिए ,वो पूरी दुनिया में लड़ाई करवाता फिरता है । क्या चीन और अमरीका जैसे सक्षम देश इतनी सी बात समझ नहीं पाते ,की ” जब इंसान ही नहीं रहेगा तो वो विश्व की सबसे बड़ी इकॉनमी बनके क्या करेंगे “।
आज जब सम्पूर्ण भारत में लॉकडॉउन है इस महामारी की वजह से ,तब हमें ये जरूर सोचना चाहिए ,जीवन में क्या चीजे अहम है क्या नहीं । अनाज जिसे घरों में इकट्ठा करने के लिए सब १-२ घंटे के लिए घर से बाहर निकलना चाह रहे है , हमे ये सोचना चाहिए कि ,भारत जैसा कृषि प्रधान देश भी ,कई खाने की चीजों को विदेशो से लेता है ,क्या हमे अनाज उगाने में सक्षम नहीं होना चाहिए । 
भारत जहां देश की सर्वाधिक आबादी माध्यम वर्गीय परिवार से ताल्लुक रखती है ,उसकी वैश्विक छवि भी एक मिडल क्लास या माध्यम वर्गीय परिवार जैसी ही हो गई है ,जो रिस्क नहीं लेना चाहता ,ये अच्छी बात है हम सभी देशों से मित्रता रखना चाहते है ,पर जब मित्र पीठ में छुरा मारने का काम करे ,तो हमारे देश के सम्मनानियो लोगो को ऐसे मित्र के प्रति रवैया बदलने पर भी विचार जरूर करना चाहिए ।
भारत जो विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता है ,जो विश्व का इकलौता देश है जहां एक साथ ६ से अधिक विपरीत धर्म के लोग बिना किसी भेद भाव और पूर्ण हर्ष के साथ रहते है , जहां आज भी रिश्तों कि अहमियत सबसे अधिक है , जहां इंसानियत देशप्रेम के लिए ना जाने कितने शूरवीरों ने कुर्बानी देदी, जो विश्व के सबसे प्रगतिशील देशो मे आता है । क्या हम इतने सक्षम नहीं की अपनी जरूरत और शौक के हर सामान को हम स्वदेश में ही विकसित करे।
यह लोकडाउन हमे कई चीजे सीखा रहा है ,आज हमारे और पूरे विश्व के उसी विकास की परीक्षा है जिसके लिए हम लड़ते और कार्य करते रहते है ,वो जानवर जो हमारे कैद होने पर खुले में घूम रहे है ,वो भी हस रहे होंगे हमारी ना समझी पर ,क्यूंकि किसी भी प्रजाति का जानवर अपने ही प्रजाति की जान नहीं लेता ।
यह समय है रिश्तों की अहमियत जानने का ,मुझे पूर्ण विश्वास है की ये कोरोना महामारी भारत में अपना जाल  नहीं फैला पाएगी ,पर हा हमारी वास्तविकता का आइना ,हमारे देश की गलतियां ,और हमारे समाज की साक्षरता का बोध जरूर करा जाएगी । 
सरकार निः संकोच बहुत जोर लगाकर प्रयास कर रही है ,हमारे सैनिक,डॉक्टर ,प्रशाशनिक सेवा के अधिकारी सब बहुत कठिन प्रयास कर रहे है और निश्चित ही उनका प्रयास सफल भी होगा।
परन्तु हमे इसका भी एहसास होना चाहिए कि विधायक और सांसद खरीदने से अच्छा है , आरबीआई के कोष से निकला हुआ पैसा ऐसी आपदा के समय काम आता ,और सरकार को उस मजदूर जनता से जो पहले ही ,दो वक्त की रोटी के लिए पैदल मिलो घर की ओर चलने पे मजबूर हो गई ,उन्हीं से पैसे ना मांगने पड़ते । 
अपने राष्ट्र के प्रति साफ नियत भी जरूर रखें जो मजहब और आपस की लड़ाई से कई गुना ऊपर उठ कर ,वास्तविक विश्व गुरु बनकर इस दुनिया का सही मार्गदर्शन करे ।
~ अनुराग मिश्रा

15 thoughts on “भारत,दुनिया और कोरोना ।”

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